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Yeh Subah Kab Hogi Yaaaar

Posted In India, Poetry, Thoughtworks - By Ankit Jain On Wednesday, November 19th, 2008 With 0 Comments

अंधेरे में अपनी परछाई से बातें करता हूँ
बंद कमरे में अपनी जग हँसाई से छुपा करता हूँ
इसी कशमकश में हूँ की जिंदगी जीने का नया रूप दिखा रही
अलबत्ता वो मुझसे रूठ कर जा रही है

गाड़ी अपनी बदती रही, कारवा घटता रहा
दिनभर रोया रात भर जगता रहा
आंसुयो से दर्द धोने की कोशिश में
रोया में बहुत दर्द फ़िर भी न गया

हार के और जीत के चलते रहे सिलसिले
दिल में बहुत कुछ था पर किस्से कहे ये गिले
मौत को करीब से देखा टू मुझे यूँ लगा कि
जिंदगी जीने के हमे दिन बहुत कम मिले

हँसते हुए चेहरे को अमावस की रात खा गई
न चाह कर भी अपनों से बिछड़ने की घड़ी क्यों करीब आ गई

अंकित जैन