Yeh Subah Kab Hogi Yaaaar
अंधेरे में अपनी परछाई से बातें करता हूà¤
बंद कमरे में अपनी जग हà¤à¤¸à¤¾à¤ˆ से छà¥à¤ªà¤¾ करता हूà¤
इसी कशमकश में हूठकी जिंदगी जीने का नया रूप दिखा रही
अलबतà¥à¤¤à¤¾ वो मà¥à¤à¤¸à¥‡ रूठकर जा रही है
गाड़ी अपनी बदती रही, कारवा घटता रहा
दिनà¤à¤° रोया रात à¤à¤° जगता रहा
आंसà¥à¤¯à¥‹ से दरà¥à¤¦ धोने की कोशिश में
रोया में बहà¥à¤¤ दरà¥à¤¦ फ़िर à¤à¥€ न गया
हार के और जीत के चलते रहे सिलसिले
दिल में बहà¥à¤¤ कà¥à¤› था पर किसà¥à¤¸à¥‡ कहे ये गिले
मौत को करीब से देखा टू मà¥à¤à¥‡ यूठलगा कि
जिंदगी जीने के हमे दिन बहà¥à¤¤ कम मिले
हà¤à¤¸à¤¤à¥‡ हà¥à¤ चेहरे को अमावस की रात खा गई
न चाह कर à¤à¥€ अपनों से बिछड़ने की घड़ी कà¥à¤¯à¥‹à¤‚ करीब आ गई
अंकित जैन
